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सम्पूर्ण कौन है _ लखनऊ:- आज के समय मे जो तन और धन से सक्षम है उसी को सम्पूर्ण इंसान समझा जाता है अगर कोई तन से विकलांग है या उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नही है तो उसे सब एक अपूर्ण और नकारा इंसान समझते है हेय दृष्टि से देखते है यही मानसिकता है सम्पूर्णता की।


सम्पूर्ण कौन है...

लखनऊ:- आज के समय मे जो तन और धन से सक्षम है उसी को   सम्पूर्ण इंसान समझा जाता है अगर कोई तन से विकलांग है या उसकी आर्थिक स्थिति ठीक नही है तो उसे सब एक अपूर्ण और नकारा इंसान समझते है हेय दृष्टि से देखते है यही मानसिकता है सम्पूर्णता की।

मेरी दृष्टि मे ऐसी  सोंच  रखने वाला हर वो इंसान अपूर्ण और विकलांग है जो स्वयं को महत्वपूर्ण और दूसरो को महत्वहींन समझता है सबको अपनी सोंच की कसौटी पर तोलता है। सबको तोलते वक्त वो स्वयं को तोलना भूल जाता है क्योकि उसे तो अभिमान होता है स्वयं की सम्पूर्णता का अपने  ज्ञान का वैभव का वो ये कभी जान ही नही पाता वो कितना अपूर्ण है जिसे वो विकलांग या छोटा समझकर हेय दृष्टि से देखता है उसकी अपूर्णता तो सबकी नजरे देख पाती है क्यूकि वो तो प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है परंतु जो मानसिक रुप से विकलांग है अपूर्ण है अपनी सोंच और विचारो से सबसे छुपाये रहता है अपनी कमजोरी को हर एक पर अपनी झूठी शान का धाक बनाना चाहता है कि वो तो सम्पूर्ण है कुछ भी कर या कह सकता है।

ऐसे लोगो की दिनचर्या ही स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना होता है चाहे जैसे भी इनके जीवन का सबसे श्रेष्ठ और अहम मुद्दा होता है औरो को नीचा  दिखाना , अपमानित करना इसी से शुरुवात होती है इनके दिन की चाहे घर रहे या बाहर जी हुजूर सूनना इनके कानो को बहुत अच्छा लगता है । दूसरो को तिरस्कृत करके इनकी जुबान मीठी हो जाती है। अपमानित करने का स्वाद ही निराला होता है जिसे ये जब चाहे  जहाँ चाहे मजे से ले लेते है सम्पूर्ण जो होते है।

परंतु ये भूल जाते है कि दिखाई देने वाली कमियां तो किसी न किसी तरह पूरी की जा सकती है मगर आंतरिक विकलांगता को स्वयं ही दूर करना होता है संकीर्ण मन या सोंच रखने वाला इंसान बोझ होता है क्यूकि दूसरो को खाली और खुद को महानता से लबालब भरा पाता है कभी स्वीकार ही नही पाता की उसमे भी त्रूटि या कमी है।
 सबकुछ तो है फिर कैसी कमी मान, प्रतिष्ठा, दौलत , सोहरत और क्या चाहिए पर क्या इन सबमे इंसानियत भी है,  हम भी है कही?

यही सवाल खुद से करना भूल जाते है भटकते रहते है उस मृग की तरह जिसकी कस्तूरी उसकी ही नाभि मे होती है परंतु उसकी महक उसे भटकाती रहती है वो जान ही नही पाता कि जिस महक के लिए वो भटक रहा है वो उसी की है ठीक वैसे ही अधिक से अधिक पा लेने की हमारी तृष्णा हमे कभी तृप्त ही नही होने देती हमारी जिंदगी हमेशा तुलनात्मक ही रहती है। भावनात्मक तो हम हो ही नही पाते बस तुलना ही करते रह जाते है दूसरो की उनके पास ये है तो हमारे पास क्यूँ नही इसी मे उलझे जीवन के अनमोल पलो को खोते रहते है जितना मिला था उसे भी हर पल नष्ट करते रहते है सिर्फ लालसा और तृष्णा के पीछे भागते रहते है।

मेरी सोंच तो यही कहती है शारीरिक और भौतिक सम्पूर्णता से ज्यादे महत्वपूर्ण मानसिक सम्पूर्णता होती है तन अगर कमजोर भी हो तो  अगर मन सुदृढ और मजबूत है तो हम कुछ भी कर  सकते है।

मेरी नजर मे हर वो इंसान सम्पूर्ण और सक्षम है जो इंसानियत को सर्वोपरी मानता है, स्वयं को जानता और समझता है, अगर किसी को झुकाना जानता है तो झुकता भी है। सम्मान चाहता है तो सम्मान देता भी है।

छल,कपट,फरेब का जाल हमारे चारो ओर फैला है पर जो इन सबसे परे हो, सच्चा हो, ईमानदार हो,स्वाभिमानी हो किसी की आर्थिक स्थिति देखकर सम्मान न देता हो बल्कि उसके विचारो को उसकी अभिव्यक्ती के आधार पर एक इंसान होने के नाते उसे सम्मान पूर्वक देखता हो वही सम्पूर्ण और नेक इंसान है।
 
क्यूँ ना दिखावे का जीवन छोड़कर स्वयं को स्वयं की अपूर्णता का भान कराए उसे स्वयं ही दूर करे। एक सम्पूर्ण और नेक इंसान बने जो सिर्फ तन और धन से ही नही बल्कि इंसानियत से सक्षम हो।
परिपूर्ण हो मानसिक और व्यवहारिक रुप से यही हमारी  वास्तविक संम्पूर्णता होगी।


संपादकीय= प्रफुल्ल सिंह "बेचैन कलम"
युवा लेखक/स्तंभकार/साहित्यकार= खोज जारी है न्यूज चैनल हिन्दी दैनिक समाचार पत्र
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
व्हाट्सएप : 6392189466



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