#हरदोई:- संगोष्ठी में साहित्यकारों को किया सम्मानित, अवधी भाषा के विकास यात्रा विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन#
#हरदोई:- संगोष्ठी में साहित्यकारों को किया सम्मानित, अवधी भाषा के विकास यात्रा विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन#
#हरदोई: डॉ. राम मनोहर लोहिया महाविद्यालय, अल्लीपुर हरदोई तथा उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ के संयुक्त तत्वावधान में महाविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में "अवधी भाषा के विकास यात्रा" विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ मां शारदे के समक्ष दीप प्रज्जवलित एवं पुष्पर्जन कर किया। कौशलेंद्र प्रताप सिंह "राष्ट्रवर"ने वाणी वंदना प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि कमलेश कमल-जन सम्पर्क अधिकारी एवं प्रकाशन प्रमुख, ITBP, नई दिल्ली ने उद्बोधन में कहा कि अवधी भाषा की विकास यात्रा अर्द्धमागधी अपभ्रंश से शुरू हुई, जो कोसल (अयोध्या) क्षेत्र की 'कोसली' बोली से विकसित होकर, भक्तिकाल में तुलसीदास (रामचरितमानस) और जायसी (पद्मावत) जैसे कवियों के हाथों साहित्यिक भाषा बनी, जिसने प्रेमाख्यान और भक्ति काव्य को समृद्ध किया#
#स्वागत व संस्थान परिचय डॉ देवी प्रसाद तिवारी ने रखा।संगोष्ठी की मुख्य वक्ता डॉ. अमिता दूबे प्रधान संपादक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ ने कहा आधुनिक काल में खड़ी बोली के प्रभाव से इसका साहित्यिक रूप सीमित हुआ, पर लोक-साहित्य और भाषा-अध्ययन में इसका महत्व आज भी बना हुआ है, जो इसे हिंदी की एक महत्वपूर्ण पूर्वी उपभाषा के रूप में स्थापित करता है। प्राचीन काल से अवधी की जड़ें इंडो-आर्यन भाषा परिवार में हैं और यह अर्द्धमागधी प्राकृत से विकसित हुई मानी जाती है। प्राचीन कोसल (अयोध्या) क्षेत्र की स्थानीय बोली, जिसे 'कोसली' कहा जाता था, अवधी के विकास का आधार बनी#
#संगोष्ठी के अध्यक्ष और सार्वजनिक शिक्षोन्नयन संस्थान के संस्थापक- प्रबंधक तथा अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी"मधुपेश" ने कहा कि भक्तिकाल अवधी का सबसे स्वर्ण काल था, जब इसे साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिली। गोस्वामी तुलसीदास ने 'रामचरितमानस' की रचना करके अवधी को उत्कर्ष प्रदान किया, जो इसका सबसे महान काव्य ग्रंथ है। मलिक मुहम्मद जायसी ने 'पद्मावत' जैसे प्रेमाख्यान (सूफी काव्य) लिखे, जिससे अवधी का साहित्यिक स्वरूप और निखरा अन्य संत कवि जैसे मलूकदास ने भी अवधी में रचनाएं कीं। विशिष्ट अतिथि डॉ. ब्रह्म स्वरूप पांडे ने कहा कि रीतिकाल एवं आधुनिक काल भक्तिकाल के बाद अवधी का काव्य भाषा के रूप में प्रयोग कम हुआ, पर यह समाप्त नहीं हुआ। 1857 के विद्रोह के केंद्र अवध में मौखिक साहित्य की रचना हुई और बलभद्र प्रसाद 'पढीस', बंशीधर शुक्ल जैसे कवियों ने इस काल में अवधी में लिखा#
#आधुनिक काल में खड़ी बोली के बढ़ते प्रभाव के कारण अवधी का साहित्यिक विकास कुछ हद तक अवरुद्ध हुआ और इसे अक्सर हिंदी की एक बोली मान लिया जाता है। आज भी यह उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र (लखनऊ, अयोध्या, रायबरेली आदि) में व्यापक रूप से बोली जाती है और लोक साहित्य तथा आंचलिक रचनाओं में इसका प्रयोग होता है। इसे कोजली, कोसली, बैसवारी आदि नामों से भी जाना जाता है। मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है, कभी-कभी कैथी लिपि का भी प्रयोग होता है। संगोष्ठी में जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार मदन मोहन पाण्डेय, डॉ. ईश्वर चंद्र वर्मा, निशानाथ अवस्थी "निशंक", राजकुमार सिंह "प्रखर", विपिन त्रिपाठी, सुखदेव पाण्डेय "सरल", अरविन्द मिश्र, डॉ.शीला पाण्डेय, डॉ. राहुल सिंह आदि को सम्मानित किया गया#
#डॉ. देश दीपक शुक्ल ने संगोष्ठी का संचालन करते हुये कहा हिंदी के विकास में अवधी का अमिट प्रभाव रहा है, और इसे आधुनिक हिंदी की नींव रखने वाली भाषाओं में से एक माना जाता है। अवधी एक समृद्ध ऐतिहासिक और साहित्यिक परंपरा वाली भाषा है, जिसने भक्ति और प्रेम-काव्य के माध्यम से हिंदी साहित्य को अनमोल धरोहर दी है और आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है।संगोष्ठी में श्रीमती स्नेहल पांडे अध्यक्ष सार्वजनिक शिक्षण एवं संस्थान तथा भारी संख्या में छात्र-छात्राएं व डॉ. शशिकांत पाण्डेय, डॉ. विवेक बाजपेई, डॉ रश्मि द्विवेदी, आनन्द विशारद, शुभम मिश्रा, दीपक कुमार, संजीव अस्थाना आदि शिक्षक गण व शिक्षणेत्तर कार्यकर्ता उपस्थित रहे#

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