#अयोध्या:- राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई, भूपतियों ने छला था अब पूँजी पतियों से छली गई। का भाव प्रगट करते प्रिय मित्र देश के जाने- माने कवि प्रियांशु- गजेंद्र की यह कविता#
#अयोध्या:- राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई, भूपतियों ने छला था अब पूँजी पतियों से छली गई। का भाव प्रगट करते प्रिय मित्र देश के जाने- माने कवि प्रियांशु- गजेंद्र की यह कविता#
#अयोध्या: में राम आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई, भूपतियों ने छला था अब पूँजी पतियों से छली गई है#
#राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई#
#सरयू की लहरों का रंग अब थोड़ा-थोड़ा परिवर्तित है, राम लला के दर्शन अब से धनवानों को आरक्षित है#
#आओ रहो अयोध्या आओ कहते रोज सदी के नायक, लगी दुकानें भक्ति भाव की मोल भाव करना वर्जित है।बेचारे हिरणों पर अब स्वर्णिम मृगछाला मढ़ी गई है, राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई। लम्बे चौड़े राजमार्ग ने टेढ़ी मेढ़ी गलियाँ खायी, दिव्य आस्था ने संस्कृति ने भौगोलिक वैश्विक गति पायी। भीतर बैठी गहन आस्था बाहर उगते नव विकास को, चिढ़ा रहे हैं एक दूसरे को जैसे देवर भौजाई। कागज के सब फूल उगाये गए हटायी कली गई है, राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई है। चिमटे, घण्टे, रामधुनें अब गाती हैं आधुनिक मशीनें, वातानुकूलित कक्षों ने सोख लिए बिन बहे पसीनें। नाम लिखाने वाली मुंदरी लाता था झूला मेले से, नए नए जौहरी आ गए मुंदरी में जड़ गए नगीनें। रौनक अच्छी भली हुई पर आभा अच्छी भली गई है, राम अयोध्या आए लेकिन कहीं अयोध्या चली गई#

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