#लखनऊ:- बंगाल- में ममता की हार के बाद अखिलेश का राजनीतिक भविष्य#
#लखनऊ:- बंगाल- में ममता की हार के बाद अखिलेश का राजनीतिक भविष्य#
#लखनऊ: क्या अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले आत्मसमर्पण कर सकते हैं? पिछले दो विधानसभा चुनाव में हार के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अयोध्या सहित 37 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया था। कांग्रेस ने भी 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में छः सीटों पर जीत हासिल की थी। आज बंगाल में ममता बनर्जी की जबरदस्त हार और भाजपा की अभूतपूर्व जीत से देशभर का विपक्षी खेमा गहरे सदमे में पहुंच गया होगा। इनमें सबसे अधिक चिंतित अखिलेश यादव हो सकते हैं जो 2027 में सत्ता में वापसी के लिए न केवल बड़े बड़े सपने संजो रहे हैं बल्कि जमीनी स्तर पर परिश्रम भी कर रहे हैं। बंगाल का चुनाव उनके लिए भी एक परीक्षण था जिसमें यदि ममता बनर्जी की हार न हुई होती तो अखिलेश के लिए उत्तर प्रदेश में जीत हासिल करने का हौसला बरकरार रह सकता था। ममता बनर्जी को जिस प्रकार भाजपा ने हराया,वह किसी भी विपक्षी दल के लिए खतरे की घंटी हो सकता है। बंगाल जीतने के लिए भाजपा ने कोई कोर कसर उठा कर नहीं रखी थी।ममता बनर्जी और उनकी पार्टी किसी भी स्तर पर चुनाव को प्रभावित करने में सफल नहीं हो सकी। उनके तथाकथित गुंडों को घरों में छिपे रहने पर विवश कर दिया गया। चुनाव को पैरामिलिट्री फोर्स के बल पर पहली बार रक्तहीन कराया गया। विशेष पुनरीक्षण कार्यक्रम के जरिए लाखों फर्जी मतदाताओं को चुनाव से दूर कर दिया गया और भय से वोट डालने से कतराने वाले मतदाताओं को सुरक्षा का भरोसा दिया गया।इसी कारण पहले चुनावों के मुकाबले ज्यादा मतदान हुआ और भाजपा मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर भी जीती। क्या यह सारी रणनीति अखिलेश यादव का हौसला तोड़ने के लिए काफी नहीं हैं?अब ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप बेमानी हो चुका है परंतु सरकारी मशीनरी के भरपूर उपयोग या दुरुपयोग का आरोप अभी भी जीवित है।हारने वाली राजनीतिक पार्टी ऐसा आरोप लगाकर अपनी हार की वजह के साथ आंख-मिचौली खेलती हैं।जो सच है उसे स्वीकारना राजनीति में अच्छा नहीं माना जाता है। भाजपा के चुनाव जीतने की आदत के समक्ष मामूली परंपरागत रणनीतियां बहुत काम की नहीं रही हैं। क्या अखिलेश यादव सहित विपक्षी दलों के पास चुनाव जीतने का कोई और फॉर्मूला है? पीडीए, मुफ्त बिजली और बेरोज़गारी भत्ता जैसे प्रलोभन एक खास#
#वर्ग को तो आकर्षित करते हैं परन्तु जीत की दहलीज तक पहुंचाने की गारंटी नहीं हैं। तो क्या अखिलेश यादव को भाजपा के समक्ष अपने मरहूम अब्बा हुजूर की भांति भाजपा को जीतने की शुभकामनाएं देने के साथ अपनी हार की तैयारी करनी चाहिए? राजनीति में हजारों के अंतर से पीछे होने के बावजूद अंतिम वोट की गिनती तक हार स्वीकार करने की परंपरा नहीं है। अखिलेश भी कोई नयी परंपरा स्थापित करना नहीं चाहेंगे#

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