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#दिल्ली:- मतदाता सूची पुनरीक्षण, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और भारतीय लोकतंत्र#


#दिल्ली:- मतदाता सूची पुनरीक्षण, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और भारतीय लोकतंत्र#

#भारतीय लोकतंत्र अपने इतिहास के सबसे संवेदनशील और निर्णायक दौर से गुजर रहा है। देश की लोकतांत्रिक रूपरेखा, संवैधानिक मर्यादाएं और स्वतंत्र संस्थाओं की विश्वसनीयता आज गंभीर वैचारिक, विधिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) की प्रक्रिया, उससे जुड़े विवाद, चुनाव आयोग (Election Commission of India - ECI) की कार्यप्रणाली, और संसद से निर्वाचन सदन तक विपक्षी सांसदों के शांतिपूर्ण मार्च को रोके जाने की घटना ने भारतीय गणराज्य की साख पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह स्थिति केवल राजनीतिक दलों के बीच की खींचतान नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 324, नागरिक अधिकारों, और हमारे लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा से जुड़ा राष्ट्रहित का विषय है#

#संवैधानिक एवं विधिक परिप्रेक्ष्य: चुनाव आयोग की स्वायत्तता और पारदर्शिता#

#भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को सौंपी गई है। संविधान निर्माताओं ने इस संस्था को कार्यपालिका के प्रत्यक्ष नियंत्रण से मुक्त रखा था ताकि यह बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्षता से कार्य कर सके। परंतु, हालिया एसआईआर प्रक्रिया और इससे जुड़े विवादों ने इस स्वायत्तता की साख पर बट्टा लगाया है#

#पारदर्शिता का अभाव और 13 करोड़ नामों का विलोपन: एसआईआर प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम सूची से बाहर किए जाने का आंकड़ा अपने आप में अभूतपूर्व और चिंताजनक है। इतनी बड़ी संख्या में नागरिकों का मताधिकार से वंचित होना या प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण सूची से बाहर होना, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह हर एक कदम पर पूर्ण पारदर्शिता बरते, किंतु जवाबदेही के अभाव ने जनता के मन में शंकाएं पैदा कर दी हैं#

#न्यायिक टिप्पणियां और संस्थागत विश्वसनीयता: हाल ही में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा फॉर्म 6 में किए गए संशोधनों पर की गई टिप्पणी—कि "किसी भी संशोधित फॉर्म 6 को हमने मंजूरी नहीं दी है"—चुनाव आयोग के दावों की पोल खोलती है। आयोग का यह दावा करना कि संशोधन सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से किए गए, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसका खंडन किया जाना, यह दर्शाता है कि संस्थागत स्तर पर किस प्रकार तथ्यों को मोड़ा जा रहा है। फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ना, जिसमें नए मतदाताओं को अपने माता-पिता की पिछली एसआईआर मैपिंग की जानकारी देने के लिए बाध्य किया गया, नागरिकों की निजता और सुगम मतदान के अधिकार पर एक अनावश्यक प्रहार है#

#आंतरिक असहमति का दमन: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच कथित तौर पर इन संशोधनों पर असहमति और आपत्तियों का सार्वजनिक होना यह सिद्ध करता है कि निर्णय लेने की आंतरिक प्रक्रिया भी संदेह के घेरे में है#

#2. लोकतांत्रिक अधिकार और विरोध प्रदर्शन का संवैधानिक मूल्य#

#लोकतंत्र की जीवंतता इस बात पर निर्भर करती है कि वहां विपक्ष और आम नागरिकों को अपनी बात कहने, असहमति जताने और सरकार तथा स्वतंत्र संस्थाओं से सवाल पूछने का अबाध अधिकार हो#

#जनप्रतिनिधियों का लोकतांत्रिक अधिकार: संसद भवन से निर्वाचन सदन तक इंडिया गठबंधन के सांसदों का शांतिपूर्ण मार्च निकालना और मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने का प्रयास करना पूरी तरह से उनके संवैधानिक अधिकारों के दायरे में आता है। संसद सदस्य करोड़ों नागरिकों के प्रतिनिधि होते हैं। यदि वे नीतिगत मामलों या चुनावी विसंगतियों पर स्पष्टीकरण मांगने के लिए चुनाव आयोग जाते हैं, तो उन्हें अपराधी की तरह रोकना लोकतांत्रिक परंपराओं का खुला उल्लंघन है#

#बल प्रयोग और दमन की संस्कृति: दिल्ली पुलिस द्वारा सांसदों को हिरासत में लेना, उन्हें बसों में भरना और राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं को आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठने के लिए मजबूर करना इस बात का प्रमाण है कि असहमति की आवाजों को दबाने के लिए राज्य मशीनरी का किस प्रकार दुरुपयोग किया जा रहा है। निर्वाचन सदन के बाहर सुरक्षा बलों और भारी पुलिस बल की तैनाती लोकतांत्रिक संस्थाओं और जनता के बीच एक दीवार खड़ी करने जैसा है, जो यह दर्शाता है कि सत्ताधारी वर्ग नागरिकों और उनके प्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह होने से कतरा रहा है#

#सामाजिक, जनहित और राष्ट्रहित का सरोकार#

#मतदाता सूची में फेरबदल और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता का सीधा संबंध देश के आम नागरिक के मौलिक अधिकारों से है#

#मताधिकार: संविधान का मूल आधार: वोट देने का अधिकार हर भारतीय नागरिक को संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे बड़ी ताकत है। यदि प्रशासनिक जटिलताओं या अस्पष्ट प्रक्रियों के माध्यम से करोड़ों पात्र मतदाताओं को इस अधिकार से वंचित किया जाता है, तो यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) पर हमला है#

#भय और अविश्वास का वातावरण: जब चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं निष्पक्ष दिखना बंद हो जाती हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी विशेष राजनीतिक दल के हितों के अनुकूल कार्य कर रही हैं, तो जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठने लगता है। राष्ट्रहित इसी में निहित है कि चुनाव प्रक्रिया दूध की तरह साफ हो, ताकि हर नागरिक चाहे वह किसी भी वर्ग, जाति या वैचारिक पृष्ठभूमि का हो, यह महसूस कर सके कि उसका मत सुरक्षित है और उसकी आवाज का मूल्य है#

#आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक गरिमा को पुनः प्राप्त करे। लोकतंत्र कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि एक जीवंत मूल्य है जो पारदर्शिता, संवाद और जवाबदेही पर टिका हुआ है। यदि निर्वाचन आयोग जैसे संस्थान सत्ता के दबाव में आकर काम करेंगे और जनता के प्रतिनिधियों से मिलने से इंकार करेंगे, तो यह भारतीय गणतंत्र की नींव को खोखला कर देगा। एसआईआर प्रक्रिया की पूरी पारदर्शिता के साथ समीक्षा होनी चाहिए, विलोपित किए गए नामों का तथ्यात्मक और सार्वजनिक सत्यापन होना चाहिए, और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्ष के वैध सवालों का सम्मान किया जाना चाहिए। राष्ट्रहित इसी में है कि संविधान की सर्वोच्चता बनी रहे और लोकतंत्र को हर प्रकार की संकीर्ण राजनीतिक लिप्तता से मुक्त रखा जाए#

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