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#हरदोई:- हरियावां- यहां लड़ैतो देवला वालो , वहां मांढ़ौ को सरदार, गांव में आज भी जहां तहां जिंदा है लोक वीर गाथाएं#


#हरदोई:- हरियावां- यहां लड़ैतो देवला वालो , वहां मांढ़ौ को सरदार, गांव में आज भी जहां तहां जिंदा है लोक वीर गाथाएं#

#हरदोई: हरियावां- जैसे जैसे युग का आधुनिकरण हो रहा है वैसे ही लोक गाथाओं का प्रचलन बंद सा हो रहा है । आज से करीब दो दशक पूर्व हर गांव में सावन माह से लोक गाथाओं में आल्हा के तख्त सज जाया करते थे । गांव के खासकर बुजुर्ग और युवा बड़े चाव से आल्हा सुना करते है । धीरे धीरे टीवी और मोबाइल प्रचलन के चलते आल्हा गायन और सुनने का कार्यक्रम अंतिम पायदान पर पहुंच गया है । थाना क्षेत्र के पीला महुआ में सतीश सिंह उर्फ बड़क्के सिंह की चौपाल पर उधऊ एंड पार्टी द्वारा जब आल्हा गायन का साप्ताहिक कार्यक्रम शुरू हुआ तो बड़े बुजुर्ग सभी चौपाल की तरफ सुनने का रुख करने लगे । वहां पहुंचकर आल्हा गायन कर गायकों ने आल्हा ऊदल की वीरता सुनाते हुए कहा माढौगण का राजा कारिया द्वारा महोबा के राजा परमाल के सेनापति दक्षराज और बक्षराज का धोखे से सर को काट दिया जाता है और आल्हा ऊदल को पिता के प्यार दुलार से अनाथ कर दिया जाता है पिता का बदला लेने के लिए आल्हा ऊदल अपने पिता के मित्र चाचा ताला सैय्यद की देख रेख में भेष बदलकर माधौ गण पर चढ़ाई करते है और अंत में राजा कारिया का शीश काटकर अपने पिता का बदला लेते है । आल्हा गायन के दौरान सबसे खास बात यह देखने को मिली आल्हा गायन सुन रहे बुजुर्ग काफी खुश और जोश में दिखे । आल्हा सुन रहे बुजुर्ग नेपाल सिंह ने बताया कि आल्हा सुनने में अलग ही आनंद है आल्हा सुनने से खून में गर्मी आ जाती है लेकिन अब आल्हा गायन धीरे धीरे समापन की ओर दिख रहा है आल्हा ऊदल मलिखान जैसे वीर योद्धाओं की गाथाओं को जिंदा रखने के लिए सरकार को प्रोत्साहित करना चाहिए#

#इस मौके पर सतीश सिंह, डॉ शकील खां, नरेंद्र कुमार, उदयपाल, होरीलाल, सोनपाल , हरिश्चंद्र इशरार खान, मूलचंद्र , सुरेश वर्मा, आदि श्रोता मौजूद रहे#

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